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What is Euthanasia? जानें भारत में इसकी स्थिति और प्रभाव

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What is Euthanasia? जानें भारत में इसकी स्थिति और प्रभाव

हाल ही में भारत में सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के 31 साल के हरीश राणा को पैसिव इच्छा मृत्यु (Passive Euthanasia) की मंजूरी दी थी, जिसके बाद 24 मार्च 2026 को उनका निधन हो गया। बता दें कि हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से कोमा में थे।

उनके परिवार ने उनकी गंभीर हालत को देखकर सुप्रीम कोर्ट में उनकी इच्छा मृत्यु के लिए कोर्ट में याचिका दायर की थी। लेकिन क्या आपने यूथेनेशिया के बारे में सुना है (Euthanasia in hindi)? अगर नहीं तो, चलिए आज हम आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं।

क्या होता है यूथेनेशिया (Euthanasia Meaning in Hindi)?

यूथेनेशिया का हिंदी नाम 'इच्छा मृत्यु' है। यह एक ऐसी प्रोसेस है, जिसमें किसी व्यक्ति के जीवन को हमेशा के लिए समाप्त किया जाता है। लेकिन ऐसा तभी किया जा सकता है, जब सामने वाला व्यक्ति गंभीर पीड़ा से जूझ रहा हो और इस तरह की पीड़ा का कोई अंत ना हो। अगर इस तरह की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, तब उस व्यक्ति की सहमति के बाद उसे इच्छा मृत्यु दी जाती है, जिसे यूथेनेशिया कहा जाता (Euthanasia meaning in hindi)? है। इसे 'दयालु मृत्यु' भी बोला जाता है।

यूथेनेशिया कितने प्रकार का होता है (Types of Euthanasia in Hindi)?

यूथेनेशिया दो प्रकार का होता है, जिनके नाम हैं एक्टिव और पैसिव यूथेनेशिया (Active and passive euthanasia in hindi)।

एक्टिव यूथेनेशिया (Active Euthanasia Meaning in Hindi)

Active Euthanasia एक ऐसी प्रोसेस है, जिसमें डॉक्टर द्वारा मरीज को जानबूझकर इस प्रकार की दवाई दी जाती है, जिससे उस मरीज के जीवन को समाप्त किया जा सके। दरअसल, जब कोई व्यक्ति किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो जाता है और उसे असहनीय पीड़ा महसूस होती है।

इसके साथ ही ऐसी पीड़ा का कोई इलाज संभव ना हो, तब उस व्यक्ति की इच्छा प्राप्त कर और उसे इस तरह की असहनीय पीड़ा से मुक्ति प्रदान के लिए जो मृत्यु दी जाती है, उसे ही एक्टिव यूथेनेशिया (Active euthanasia meaning in hindi) कहा जाता है। उदाहरण के रूप में, एक्टिव यूथेनेशिया आमतौर पर कैंसर की लास्ट स्टेज पर पहुंचने वाले व्यक्ति के लिए लागू किया जा सकता है।

पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia Meaning in Hindi)

पैसिव यूथेनेशिया एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें असहनीय पीड़ा से ग्रस्त मरीज को उसके जीवन से मुक्ति दिलाने के लिए इलाज को जानबूझकर रोक दिया जाता है। साधारण शब्दों में समझें तो, Passive Euthanasia का उद्देश्य उस व्यक्ति को मृत्यु के लिए छोड़ देना है, जो किसी गंभीर बीमारी से परेशान है और जिसका इलाज संभंव नहीं है। पैसिव यूथेनेशिया में डॉक्टर्स लाइफ सेविंग ट्रीटमेंट्स जैसे- वेंटिलेटर या एंटीबायोटिक्स को बंद कर देते हैं।

ऐसा करने से मरीज की डेथ नेचुरल तरीके से होती है। इस प्रोसेस में मरीज की मृत्यु उस समय होती है, जब उसके इलाज को पूरी तरह से रोक दिया जाता है और उसे किसी भी प्रकार के ट्रीटमेंट की मदद नहीं दी जाती है। पेसिव यूथेनेशिया में व्यक्ति को मुक्ति देने के लिए किसी दवा का सहारा नहीं लेना होता है, बल्कि इलाज रोकने या लाइफ सेविंग ट्रीटमेंट को रोकने के द्वारा मृत्यु दी जाती है। इस तरह से व्यक्ति को इच्छा मृत्यु (Euthanasia a wish for death meaning in hindi) दी जाती है।

इस प्रक्रिया को तब ही किया जाता है, जब व्यक्ति की इच्छाशक्ति या फिर उसके परिवार की सहमति शामिल होती है। पैसिव यूथेनेशिया को दयालु मृत्यु भी कह (Passive euthanasia in hindi) सकते हैं।

किन देशों में लागू है यूथेनेशिया?

यूथेनेशिया में किसी व्यक्ति के जीवन को समाप्त करने के लिए उसकी सहमति या उसके परिवार की सहमति के बाद ही उसे मुक्ति दी जाती है। बता दें कि अलग-अलग देशों में यूथेनेशिया पर अलग-अलग कानूनी, नैतिक और धार्मिक दृष्टिकोण देखने को मिलेंगे। यूथेनेशिया कुछ देशों जैसे नीदरलैंड्स, बेल्जियम, स्विट्जरलैंड, कनाडा, कोलंबिया और लक्समबर्ग में लागू है। वहीं, भारत में इसकी स्थिति थोड़ी जटिल है। आइए समझते हैं।

भारत में यूथेनेशिया की स्थिति (Euthanasia Effect in India in Hindi)

बात करें भारत में यूथेनेशिया की स्थिति की तो, यह काफी जटिल रही है। भारत में एक्टिव यूथेनेशिया को आज भी अवैध माना जाता है। यह प्रोसेस आज भी भारत में नैतिक, कानूनी और धार्मिक नजरिए के जटिल मुद्दे से जूझ रही है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मुद्दे पर अब तक कोई फैसला नहीं लिया है और इसे आज भी अवैध ही माना जाता है।

वहीं, पैसिव यूथेनेशिया को सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में कुछ शर्तों के साथ एक एतिहासिक निर्णय में इसे कानूनी रूप से मंजूर कर दिया था। माना जाता है कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय (Law relating to passive euthanasia in india in hindi​) जीवन के अधिकार और व्यक्ति की स्वतंत्रता पर आधारित था। इस फैसले की वजह से भारतीय कानून में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन भी देखने को मिले। आइए इस केस के बारे में विस्तार से समझते हैं।

पैसिव यूथेनेशिया से जुड़ा लॉ (Law Relating to Passive Euthanasia in India)

जैसा कि हमने ऊपर पड़ा कि हरीश राणा यूथेनेशिया यानी की इच्छा मृत्यु दी गई थी। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हरीश राणा VS उत्तर प्रदेश का केस पैसिव यूथेनेशिया से संबंधित था, जो कि भारतीय कानून व्यवस्था (इंडियन जस्टिस सिस्टम) पर पहला और महत्वपूर्ण फैसला था।

हरीश राणा गाजियाबाद का निवासी था, जो कि पिछले 13 सालों से कोमा में था। मेडिकल ट्रीटमेंट के बाद भी इतने सालों में उसकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। वह पूरी तरह से वेंटिलेंटर पर ही निर्भर था। उसकी असाध्य और गंभीर स्थिति को देखकर उसके परिवार वालों ने उसे इस असहनीय पीड़ा से मुक्ति दिलाने के लिए पैसिव यूथेनेशिया की मंजूरी के लिए सुप्रीम कोर्ट में पिटिशन फाइल की थी।

पूरा मामला सुनने और समझने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ पैसिव यूथेनेशिया को मंजूरी (India's supreme court has allowed passive euthanasia in hindi) दी और हरीश राणा को उनके जीवन से मुक्ति प्रदान करने का आदेश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर राय देते हुए कहा कि अगर किसी व्यक्ति की शारीरिक क्षमता पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है और अब इलाज के द्वारा भी उसे ठीक नहीं किया जा सकता है, तो इस स्थिति में उसे पैसिव यूथेनेशिया यानी की दयालुता से मृत्यु दी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह निर्णय व्यक्ति की इच्छाशक्ति, आत्मनिर्णय और मानवधिकार के सम्मान को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।

यूथेनेशिया से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया

अगर किसी व्यक्ति को Euthanasia यानी की इच्छा मृत्यु दी जाती है, तो उसे इन सारी प्रोसेस को फॉलो करना होगा।

  • सबसे पहले व्यक्ति की स्थिति की जांच मेडिकल बोर्ड द्वारा की जाएगी।
  • इसके बाद स्वतंत्र मेडिकल रिपोर्ट पेश होगी।
  • यूथेनेशिया के लिए व्यक्ति और उसके परिवार की सहमति अति आवश्यक है।
निष्कर्ष

यूथेनेशिया एक ऐसा विषय है, जो कि व्यक्ति के जीवन, मृत्यु, स्वतंत्रता, नैतिकता और मानवाधिकार से जुड़ा हुआ है। यह व्यक्ति को एक ऐसी पीड़ा से छुटकारा दिलाता है, जो कि उसके लिए असाध्य और असहनीय होती है। यह व्यक्ति के जीवन के समापन का आधार है। पहले ये केवल कुछ देशों जैसे नीदरलैंड्स, बेल्जियम, स्विट्जरलैंड, कनाडा, कोलंबिया और लक्समबर्ग में ही देखने को मिलता था। लेकिन 2018 के बाद इसे भारत में भी मान्य किया गया है।

भारत में केवल पैसिव यूथेनेशिया मान्य है, जिसे 2018 में लागू किया गया था। लेकिन एक्टिव यूथेनेशिया आज भी अवैध है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2018 में लिया गया अहम फैसला पैसिव यूथेनेशिया की स्थिति (India's supreme court has allowed passive euthanasia in hindi) को भारत में मजबूती प्रदान करता है, जो कि व्यक्ति को अपने जीने के अधिकार और मरने के अधिकार के लिए स्वतंत्रता प्रदान करता है।

यह फैसला उन व्यक्तियों के लिए महत्वपूर्ण माना गया है, जो कि असाध्य बीमारी से जूझ रहे हैं। बता दें कि कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब भी किसी व्यक्ति की स्थिति असाध्य हो जाती है और वह अपनी मर्जी से अपना जीवन समाप्त करने की इच्छा व्यक्त करता है, तो उसे ऐसा अधिकार मिलना चाहिए।

कोर्ट इस फैसले को व्यक्ति के अधिकार से जोड़कर देख रहा है, तो वहीं दूसरी तरफ आज भी यह फैसला नैतिक, धार्मिक और कानूनी दृष्टि से विवाद का विषय बना हुआ है। लोगों का कहना है कि आगे चलकर लोग इस फैसले का गलत इस्तेमाल कर सकते हैं। इसलिए इस नियम पर कोर्ट को दोबारा विचार विमर्श करने की आवश्यकता है।

अगर इस फैसले को सकारात्मक रूप में देखा जाए तो भारत में यूथेनेशिया (Euthanasia in india in hindi​) पर कोर्ट का ये निर्णय दर्शाता है कि व्यक्ति को अपने जीवन का अंतिम फैसला भी स्वतंत्रता के साथ लेने का अधिकार है। लेकिन यह तब तक ही सही है, जब तक इसका इस्तेमाल उचित तरीके से किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

यूथेनेशिया एक ऐसी प्रोसेस है, जिसमें किसी व्यक्ति की इच्छा और परिवार से सहमति लेने के बाद उसे हो रही असहनीय पीड़ा से मुक्ति दिलाने के लिए जानबूझकर मृत्यु दी जाती है।

अगर किसी व्यक्ति को यूथेनेशिया यानी की इच्छा मृत्यु दी जाती है, तो सबसे पहले व्यक्ति की स्थिति की जांच मेडिकल बोर्ड द्वारा की जाएगी। इसके बाद स्वतंत्र मेडिकल रिपोर्ट जारी होगी। इन सभी के बीच यूथेनेशिया के लिए व्यक्ति और उसके परिवार की सहमति भी जरूरी होगी।

यूथेनेशिया ऐसे व्यक्ति को दिया जाता है, जो कि गंभीर और असहनीय पीड़ा से जूझ रहे होते हैं और उनका इलाज संभंव नहीं होता है। ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर व्यक्ति को होने वाली असाध्य और गंभीर बीमारी से इच्छा मृत्यु देकर छुटकारा दिलाया जा सकता है।

हां, भारत में यूथेनेशिया मान्य है, लेकिन पैसिव यूथेनेशिया। एक्टिव यूथेनेशिया को भारत में अवैध माना जाता है और पैसिव यूथेनेशिया को 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ मंजूरी दे दी थी। लेकिन इसके लिए व्यक्ति की सहमति, परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्ड द्वारा की गई जांच शामिल है।

Euthanasia दो प्रकार का होता है: Active Euthanasia और Passive Euthanasia.
Active Euthanasia- इसमें व्यक्ति को इच्छा मृत्यु देने के लिए जानबूझकर दवाईयां दी जाती है, ताकि व्यक्ति को अपने जीवन से मुक्ति मिल सके।
Passive Euthanasia- इसमें व्यक्ति के जीवन को समाप्त करने के लिए चल रहे इलाज को रोक दिया जाता है या उसे वेंटिलेटर से हटा दिया जाता है, ताकि व्यक्ति अपने दर्द से हमेशा के लिए मुक्ति पा सके।

यूथेनेशिया से संबंधित निर्णय लेने में काफी अधिक समय लग सकता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इसमें मेडिकल जांच, परिवार की सहमति और कानूनी प्रक्रिया को पूरा करना होता है। इस पर सभी कानूनी और नैतिक मामलों को ध्यान में रखकर ही फैसला लिया जा सकता है।

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